कुछ अनुवाद मराठी से , श्री चन्द्रशेखर गोखले के प्रेषित कर रहा हूँ । ये चार-चार पंक्तियों के शब्दचित्र हैं, जिन्हें मराठी मे ’चारोढ़ी’ कहते हैं। इन द्दश्यों को हम सभी देखते हैं , किन्तु कलमबद्ध नहीं कर पाते । मैं इनके भावानुवाद में कहाँ तक ख़रा उतरा हूँ , यह आप तय करें।
चुपचुप-सा रहकर अक्सर
तुम्हारा यूँ देखना
जैसे जमी हुई नदी का
बर्फ के नीचे बहना ।
*
तुमसे रोष, तुम्हारी ही
याद का खूबसूरत बहाना है
तुम आती हो, वो जाता है
मेरा रोष भी कितना सयाना है ।
*
तुम्हारे सानिध्य में मुझे
गुलमोहर, खिलते देखना है
फिर गुलमोहर-सा ही
खिलते तुम्हारे संग रहना है।
*
बजाय मन के, मुझे मेरे
पांवो को संभालना था, क्योंकि
मन का बहकना, हमेशा का
और पैरों का नया-नया-सा था ।
Wednesday, September 22, 2010
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