कुछ अनुवाद मराठी से , श्री चन्द्रशेखर गोखले के प्रेषित कर रहा हूँ । ये चार-चार पंक्तियों के शब्दचित्र हैं, जिन्हें मराठी मे ’चारोढ़ी’ कहते हैं। इन द्दश्यों को हम सभी देखते हैं , किन्तु कलमबद्ध नहीं कर पाते । मैं इनके भावानुवाद में कहाँ तक ख़रा उतरा हूँ , यह आप तय करें।
चुपचुप-सा रहकर अक्सर
तुम्हारा यूँ देखना
जैसे जमी हुई नदी का
बर्फ के नीचे बहना ।
*
तुमसे रोष, तुम्हारी ही
याद का खूबसूरत बहाना है
तुम आती हो, वो जाता है
मेरा रोष भी कितना सयाना है ।
*
तुम्हारे सानिध्य में मुझे
गुलमोहर, खिलते देखना है
फिर गुलमोहर-सा ही
खिलते तुम्हारे संग रहना है।
*
बजाय मन के, मुझे मेरे
पांवो को संभालना था, क्योंकि
मन का बहकना, हमेशा का
और पैरों का नया-नया-सा था ।
Wednesday, September 22, 2010
Tuesday, September 21, 2010
चुप्पी
लोग कहते हैं, आजकल मैं
बहुत चुप-सा रहता हूँ
गुमसुम, सोचता-सा,
कुछ बोलता नहीं
और मैं भी
चुपचुप-सा क्यों रहता
यदि कुछ बोल पाता।
फिर बोलने से क्या मिल ही जाते हैं
उलझी समस्याओं के हल
या थम जाता है हाहाकार?
हाँ, बेशक मिलती हैं
मरूस्थली संवेदनाएँ,
कुटिल तीखी मुस्कान
और एक निर्दयी एहसास
कि मेरा बोलना महज बोलना है
इसलिये अच्छा है
ख़ुद ही खोजूँ चुप रहकर
समस्याओं के हल।
हाँ, जो बेवजह
मेरी चुप्पी से तकलीफ़ पाते हैं
ख़ुद बोलते रहें और आश्वस्त रहें
मैं आजकल चुप ही रहता हूँ,
कुछ बोलता नहीं।
बहुत चुप-सा रहता हूँ
गुमसुम, सोचता-सा,
कुछ बोलता नहीं
और मैं भी
चुपचुप-सा क्यों रहता
यदि कुछ बोल पाता।
फिर बोलने से क्या मिल ही जाते हैं
उलझी समस्याओं के हल
या थम जाता है हाहाकार?
हाँ, बेशक मिलती हैं
मरूस्थली संवेदनाएँ,
कुटिल तीखी मुस्कान
और एक निर्दयी एहसास
कि मेरा बोलना महज बोलना है
इसलिये अच्छा है
ख़ुद ही खोजूँ चुप रहकर
समस्याओं के हल।
हाँ, जो बेवजह
मेरी चुप्पी से तकलीफ़ पाते हैं
ख़ुद बोलते रहें और आश्वस्त रहें
मैं आजकल चुप ही रहता हूँ,
कुछ बोलता नहीं।
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