आज गुलज़ार साब का जन्मदिन है और इस से मुबारक़ कोई मौका हो ही नहीं सकता था, कोई नई शुरूआत करने का। इसीलिए सब से पहली नज़्म जो यहाँ है, वो उन्हीं के लिए लिखी। अपने दिल के ख़याल लिख रहा था, नज़्म अपने आप बन गई।
ना जाने क्यूँ
तुमसे आज
राधा-सा लिपट जाने का मन है!
जानता हूँ मैं
मेरे कृष्ण
मुझ में ना तो राधा सी
पात्रता है
ना पवित्रता !
किन्तु तुम्हारे
अपार स्नेह की
सम्मोहित तरंगें
मुझमें बार-बार
राधा होने का
भरम जगाती हैं
और हर बार
तुम्हारी स्नेह पगी तरंगों में
मैं समूचा डूबता-उतराता हूँ;
वैसे तो अनेकों बार
तुम्हारी इन लहरों में भीगा हूँ
लेकिन आज
ना जाने क्यूँ
कोई और बात है!
मैं आज
मेरे कृष्ण
तुम्हारे कदमों में बैठ
तुम्हारे चरण पगारना चाहता हूँ
और चरणामृत ले
तुम्हें ख़ुद में
पूरा समो लेना चाहता हूँ
बस! आज
साथ-साथ रहना चाहता हूँ!
Wednesday, August 18, 2010
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