Wednesday, September 22, 2010

कुछ अनुवाद मराठी से , श्री चन्द्रशेखर गोखले के प्रेषित कर रहा हूँ । ये चार-चार पंक्तियों के शब्दचित्र हैं, जिन्हें मराठी मे ’चारोढ़ी’ कहते हैं। इन द्दश्यों को हम सभी देखते हैं , किन्तु कलमबद्ध नहीं कर पाते । मैं इनके भावानुवाद में कहाँ तक ख़रा उतरा हूँ , यह आप तय करें।

     चुपचुप-सा रहकर अक्सर                                     
             तुम्हारा यूँ देखना                                      
     जैसे जमी हुई नदी का                 
             बर्फ के नीचे बहना ।              
                        *                     
     तुमसे रोष, तुम्हारी ही              
            याद का खूबसूरत बहाना है         
     तुम आती हो, वो जाता है             
            मेरा रोष भी कितना सयाना है ।             
                        *
    तुम्हारे सानिध्य में मुझे          
            गुलमोहर, खिलते देखना है
    फिर गुलमोहर-सा ही
          खिलते तुम्हारे संग रहना है।
                         *
    बजाय मन के, मुझे मेरे
        पांवो को संभालना था, क्योंकि
    मन का बहकना, हमेशा का
        और पैरों का नया-नया-सा था ।

Tuesday, September 21, 2010

चुप्पी

लोग कहते हैं, आजकल मैं
बहुत चुप-सा रहता हूँ
गुमसुम, सोचता-सा,
कुछ बोलता नहीं
और मैं भी
चुपचुप-सा क्यों रहता
यदि कुछ बोल पाता।

फिर बोलने से क्या मिल ही जाते हैं
उलझी समस्याओं के हल
या थम जाता है हाहाकार?
हाँ, बेशक मिलती हैं
मरूस्थली संवेदनाएँ,
कुटिल तीखी मुस्कान
और एक निर्दयी एहसास
कि मेरा बोलना महज बोलना है
इसलिये अच्छा है
ख़ुद ही खोजूँ चुप रहकर
समस्याओं के हल।

हाँ, जो बेवजह
मेरी चुप्पी से तकलीफ़ पाते हैं
ख़ुद बोलते रहें और आश्वस्त रहें
मैं आजकल चुप ही रहता हूँ,
कुछ बोलता नहीं।

Wednesday, August 18, 2010

प्रणय-निवेदन

आज गुलज़ार साब का जन्मदिन है और इस से मुबारक़ कोई मौका हो ही नहीं सकता था, कोई नई शुरूआत करने का। इसीलिए सब से पहली नज़्म जो यहाँ है, वो उन्हीं के लिए लिखी। अपने दिल के ख़याल लिख रहा था, नज़्म अपने आप बन गई।

ना जाने क्यूँ
तुमसे आज
राधा-सा लिपट जाने का मन है!

जानता हूँ मैं
मेरे कृष्ण
मुझ में ना तो राधा सी
पात्रता है
ना पवित्रता !

किन्तु तुम्हारे
अपार स्नेह की
सम्मोहित तरंगें
मुझमें बार-बार
राधा होने का
भरम जगाती हैं
और हर बार
तुम्हारी स्नेह पगी तरंगों में
मैं समूचा डूबता-उतराता हूँ;
वैसे तो अनेकों बार
तुम्हारी इन लहरों में भीगा हूँ
लेकिन आज
ना जाने क्यूँ
कोई और बात है!

मैं आज
मेरे कृष्ण
तुम्हारे कदमों में बैठ
तुम्हारे चरण पगारना चाहता हूँ
और चरणामृत ले
तुम्हें ख़ुद में
पूरा समो लेना चाहता हूँ
बस! आज
साथ-साथ रहना चाहता हूँ!