लोग कहते हैं, आजकल मैं
बहुत चुप-सा रहता हूँ
गुमसुम, सोचता-सा,
कुछ बोलता नहीं
और मैं भी
चुपचुप-सा क्यों रहता
यदि कुछ बोल पाता।
फिर बोलने से क्या मिल ही जाते हैं
उलझी समस्याओं के हल
या थम जाता है हाहाकार?
हाँ, बेशक मिलती हैं
मरूस्थली संवेदनाएँ,
कुटिल तीखी मुस्कान
और एक निर्दयी एहसास
कि मेरा बोलना महज बोलना है
इसलिये अच्छा है
ख़ुद ही खोजूँ चुप रहकर
समस्याओं के हल।
हाँ, जो बेवजह
मेरी चुप्पी से तकलीफ़ पाते हैं
ख़ुद बोलते रहें और आश्वस्त रहें
मैं आजकल चुप ही रहता हूँ,
कुछ बोलता नहीं।
Tuesday, September 21, 2010
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